डॉ. हनुमान गोशाला दंदरौआ धाम

गोकृते स्त्रीकृते चैव गुरु विप्रकृतेअपिवा ।

हन्यन्ते येतु राजेन्द्र शक्र लोकं ब्रजन्ति ते ॥

अर्थात! गौ रछा, अबला स्त्री की रछा, गुरु और ब्राह्मण की रछा के लिए जो प्राण देते है, राजेन्द्र युधिस्ठिर! वे मनुष्य इंद्र लोक (स्वर्ग ) को जाते है! ऐसा पुराणो में आख्यान है!

इसी अवधारणा को ले कर दंदरौआ धाम के महंत महामंडलेश्वर रामदास जी महाराज ने आश्रम में डॉ हनुमान गौशाला का निर्माण किया है, जिसमे सैकड़ों बृद्ध, निःशक्त ,अंधी व अपाहिज गायों की सेवा की जा रही है! आश्रम के संतों का एक संघ दिन रात उनकी सेवा में तत्पर रहता है! उसे वे अपनी आध्यात्म साधना का अंग मानते है ! वैसे भारतीय हिन्दू संस्कृति में जन्म से लेकर निर्वाण पर्यन्त तक सभी हिन्दू संस्कारों में गौ दान का विशेष महत्व है ! यहाँ तक कि मनुष्य के मृत्यु पर्यन्त जब मनुष्य के देवलोक प्रस्थान के लिए भवसागर से पार करने के कथानक आते है तो गाय की पूंछ पकड़कर भव सागर पार करने के कथानक का पुराणो में आख्यान है!

भारतीय स्त्रियां तो जब रसोई में भोजन प्रसादी बनाती है तो सबसे पहले गऊ की रोटी बनाती है तथा नित्य गाय को रोटी खिलाती है! अनेक समर्थ श्रद्धालु जन समर्थानुसार इस आश्रम में पल रही गायों के लिए चारा भूषा की ब्यवस्था करते है!

गाय की उत्पत्ति के बिषय में एक बार महर्षि नारद ने भगवन नारायण से प्रश्न किया तो भगवान नारायण ने बताया की हे नारद ! गौमाता का प्राकट्य भगवान श्रीकृष्ण के वाम भाग से हुआ है! उन्होंने बताया कि एक समय की बात है भगवान श्रीकृष्ण राधा गोपियों से घिरे हुए पुण्य बृंदाबन में गए, और थके होने से वे एकांत में बैठ गए।

उसी समय उनके मन में दूध पीने की इच्छा जागृत हुई, तो उन्होंने अपने बाम भाग से लीला पूर्वक ''सुरभि गौ '' को प्रकट किया । उस गौ के साथ बछड़ा भी था और सुरभि के थनो में दूध भरा था! उसके बछड़े का नाम ''मनोरथ ''था! उस सुरभि गौ को सामने देख कर श्रीदामा जी ने एक नूतन पात्र पर उसका दूध दूहा! वह दूध जन्म और मृत्यु को दूर करने वाला एक दूसरा अमृत ही था !स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने उस स्वादिस्ट दूध को पिया!

भगवान नारायण ने आगे देवर्षि नारद जी को बताया कि श्री दामा जी के हाथ से वह दूध का पात्र गिर कर फूट गया और दूध धरती पर फ़ैल गया! गिरते ही यह दूध सरोवर के रूप में परणित हो गया!

जो गोलोक में ''छीर सरोवर '' के नाम से प्रसिद्द है! भगवान श्रीकृष्ण की इच्छा से उसी समय अकस्मात असंख्य कामधेनु गौएँ प्रकट हो गई !जितनी वो गायें थी उतने ही गोपी भी उस ''सुरभि '' गाय के रोमकूप से निकल आये! फिर उन गउवों से बहुत सी संताने हुई! इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण जी से प्रकट सुरभि देवी से गउवों का प्राकट्य कहा जाता है! उसी समय भगवान श्रीकृष्ण ने देवी ''सुरभि '' की पूजा की और इस प्रकार त्रिलोकी में उस देवी सुरभि की दुर्लभ पूजा का प्रचार हो गया !

पुराणो में गाय की पूजा से प्राप्त प्रतिफल का आख्यान है - जो गौशाला में स्थित गॉवों की प्रदछिणा करता है ,उसने मानों सम्पूर्ण चराचर विश्व की प्रदछिणा कर ली ! गायों की सींग का जल परम पवित्र है, वह सम्पूर्ण पापों का शमन करता है ,साथ ही गायों के शरीर को खुजलाना -शहलाना भी सभी दोष पापों का शमन करता है! गायों को ग्राश देने वाला स्वर्ग लोक में पूर्ण प्रतिष्ठा पता है ! जो ब्यक्ति लगातार एक वर्ष तक भोजन करने से पूर्व गाय को ग्राश खिलता है वह ज्ञानी बन जाता है! गउवों के लिए जो धूप और ठण्ड से बचाने वाले गौशाला का निर्माण करता है वह अपने सात कुल का उद्धार कर लेता है !

दंदरौआ धाम तो उस पवित्र धरती पर बना है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण अपनी गॉवों को चराने के लिए आया करते थे इसी लिए यहाँ के नजदीक ही गो -हद (गोहद )क़स्बा है ये नाम इसी लिए रखा गया है!

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